The Post on 16 September 2025

“Diplomacy requires a selective memory”, कूटनीति के लिए चुनिंदा याददाश्त की ज़रूरत होती है;

1973 के अरब-इसराइल जंग ने तेल का दाम बढ़ा कर यूरोप-अमेरिका को 15 साल पीछे कर दिया।तेल के बढ़े दाम ने अमेरिका को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 1979 मे चीन से दोस्ती करने पर मजबूर कर दिया।आज चालिस साल बाद चीन दुनिया का सुपर पावर हो गया और अमेरिका को हर क्षेत्र में चुनौती दे रहा है।

*15 अगस्त 2021 को इमरान खान ने “फ़ॉल आफ़ काबूल” करा कर 1979 के बाद पाकिस्तान को लम्बे जंग से राहत दिया,

*24 फ़रवरी 2022 को 82 साल बाद पुटिन ने यूक्रेन में मार-काट शुरू कर यूरोप पर जंग थोप दिया,

*10 मार्च 2023 को चीन की मध्यस्थता ने सऊदी अरब और ईरान के बीच दोस्ती का समझौता कराया,

*7 अक्टूबर 2023 को इसराइल-प्रतिरोधी ताक़तों का मार-काट शुरू हुआ,

*मई 2025 में राष्ट्रपति ट्रम्प का सऊदी अरब, क़तर और यूएई का चार दिनों का एक ऐतिहासिक दौरा हुआ जिस मे GCC ने अमेरिक मे $2.3 trillion निवेश का लालच दिया,

15 सितंबर 2025 को अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं का कतर में तवारीखी इजलास हुआ। दोहा मे 50 मुल्कों के प्रेसिडेंट और अमीर मौजूद थे।यह शिखर सम्मेलन कतर से हमदर्दी का एक खुला प्रदर्शन दुनिया और ख़ास कर अमेरिका और पश्चिमी ताक़तों के लिए था।सम्मेलन में सभी इस बात पर सहमत थे कि कतर पर बमबारी कर फ़िलिस्तीनी नेताओं को मार कर इज़राइल ने ग़लत किया।ईरानी प्रेसिडेंट मसूद पेजेशकियन और पाकिस्तान ने एक “इस्लामिक नाटो” बनाने को कहा, जो ट्रम्प या अमेरिका के defence industry या पेंटागन ने कभी नही सोंचा होगा।

#NOTE: कल जो क़तर में हुआ, वह 1876 के बाद की बदली दुनिया का एक “Historical Event” था जैसे 1973 का अरब-इसराइल जंग।

राष्ट्रपति ट्रम्प के Double Messages से “अमेरिका ग्रेट अगेन” नहीं बने गा।अब ट्रम्प को अमेरिका को टूटने से बचाने के लिए इसराइल और मिडिल ईस्ट में से मिडिल ईस्ट को चुनना होगा।

اے موجِ دجلہ تو بھی پہجانتی ہے ہم کو

اب تک ہے تیرا دریا افسانہ خواں ہمارا

(اقبال کی نظم “ ترانہ ملَی” کا ایک بند)
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Some comments on the Post

Mohammed Seemab Zaman दुनिया में कल बहुत से लोगों ने सोंचा होगा कि अरब समिट एक छोटा event होगा जैसे पहले OIC या Arab League का समिट होता आया है मगर ऐसा नहीं हुआ। अब वक्त बताये गा, आगे क्या होगा? मगर जो होगा वह बहुत अच्छा होगा।

Mohsin Khan Razvi सर अरबों के पास दौलत है, जगह है, मगर ये अब तक न्यूक्लियर पॉवर क्यों नहीं बने ?

  • Mohammed Seemab Zaman, Mohsin Khan Razvi साहेब, कोई Western power अरबों को वह technology दे गा तब न बने गा। ईरान को अमेरिका ने दिया मगर सटूदी अरब को नही दिया।कल तुर्की ने अपना self nuclear reactor बनाने को कहा है। पॉच साल बाद देखये गा यह बना दें गें फिर सब के पास हो जाये गा। तुर्की ने कहा है सब कुछ बनान है किसी दूसरे पर depend नही होना है। अरबों के पास पैसा तो है ही पॉच साल बाद देखये गा तुर्की बना दे गा, फिर यह Nuclear power भी हो जाये गें।

Salman Siddiqui 1973 की जंग से लेकर 2025 दोहा इजलास तक पूरी चेन एक बात साफ़ करती है कि मिडिल ईस्ट अब सिर्फ़ इस्लामिक उम्माह का मसला नहीं रहा बल्कि सीधा वर्ल्ड पावर बैलेंस का सेंटर है. GCC का $2.3 ट्रिलियन निवेश ऑफर सऊदी ईरान दोस्ती और कतर में 50 मुस्लिम मुल्कों का इकट्ठा होना ये सब दिखाता है कि अरब मुल्क अब अमेरिका को या तो-या की पोज़िशन पर खड़ा कर चुके हैं. Islamic NATO का आइडिया अगर आगे बढ़ा तो ये वेस्ट की 100 साल की पॉलिसी को चैलेंज कर देगा. इक़बाल का ये शेर सही जगह बैठता है उम्माह अब अपनी पोज़िशन पहचान रही है. अब वक़्त आ गया है कि अमेरिका भी Selective Memory छोड़ कर सच को देखे या इस्राईल, या पूरा मिडिल ईस्ट.

Abdul Raheem क्या अमेरिकी Judeo-Christian evangelicals की सोच बदल पाएगी?. अगर सिर्फ material benefits की बात होती तो 1970’s में ही अमेरिका साथ नहीं देता. अभी भी मई में हुई visits में, 2000 Billion के एवज़ भी F-35 की बात पक्की नहीं हुई, जबकि इजराइल को America, economic और military assistance, दोनों अलग अलग देता है. हम चीजों को self-fulfilling prophecy नहीं बनाना चाहते, लेकिन ये सोचना कि अमेरिका, इजराइल को छोड़ देगा और अरब देशों को साथ लेगा, कहां तक सही है! सोच का क्या होगा?