Post of 11th August 2025
Parmod Pahwa साहेब ने 1947 के आज़ादी और बँटवारा पर अपने आज के एक पोस्ट मे लिखा है कि “जिन्नाह आबादी की अदला बदली के विरुद्ध था जिसके कारण 12 अगस्त तक कोई शरणार्थी इधर से उधर या उधर से इधर नही आया।लेकिन उस समय के संघ के लेखन और सोच को समझे तो आसानी से समझ सकतें है कि निर्दोषों के खुन का असली गुनाहगार कौन है।”
आज कल हम हज़रत बाबा फरीदउद्दीन मसऊद गंज शकर पर एक मुस्तनद किताब पढ़ रहे हैं, जिन की पैदाईश 575 हिजरी (1173 AD) में मुल्तान के नज़दीक चावली में हुआ और वफ़ात 664 हिजरी (1265 AD) में पाई।
आप का असली नाम मसऊद था। आप के बुज़ुर्गों में फ़रूख शाह काबुल के बादशाह थे। आप चिश्तिया सिलसिला के बहुत बड़े वली थे।आप हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया के पीर भी थे।
आप के अशआर (श्लोक) पंजाबी, सरायकी, हिन्दी, फ़ारसी ज़बानों में मिलते हैं।सीखों की मुक़्द्दस मज़हबी किताब “गुरु ग्रंथ साहेब” में बाबा साहेब से मंसूब 112 श्लोक हैं।यह अश्लोक पुरानी मुल्तानी और सरायकी ज़बान में है।
गुरु ग्रंथ साहेब में बाबा फरीद के श्लोक एक अलग चैप्टर “श्लोक फरीद जी के” नाम से दर्ज है:
“रोंटी मेरी काठ की, लादन मेरी भूक्ह
जन्हा खा दी चौपडी, घने सहन गे दुख”
इस का तर्जुमा है कि रोटी मेरी काठ की और सालन मेरा भूख, जो चिकनी चपड़ी खाता है वह दुख भी बहुत उठाता है।
#NOTE: हम यह देख और पढ़ कर हैरान हो गये कि सोलहवीं सदी (1600 AD) की ग्रंथ साहेब में तेरहवीं सदी (1300 AD) के मुस्लिम सूफ़ी का पुराना क़ौल सीख समाज का मज़हबी अक़ीदा है।
इक़बाल के बांग-ए-दरा में “नानाक” पर एक नज़्म है, जो आज सौ साल बाद हिन्दुस्तान की सही अक्कासी है:
“शमा-ए-हक़ से जो मोनव्वर हो यह वह महफ़िल न थी
बारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीन क़ाबिल न थी”
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Some comments on the Post
Mohammed Seemab Zaman समझ में नहीं आता है कि संघ क्यों भारतीय समाज में ज़हर पैदा कर मुल्क का बटवारा किया? 1935 से मूल्क मे दंगा-नवमी कर के देश का जीडीपी जला जला कर समाज को ग़रीब बना दिया।
यह पढ़ कर हम को यक़ीन हो गया कि संघ का “अखंड भारत” का नारा झूठा है।इक़बाल के “नानक” नज़्म को पूरा पढ़िये और सोंचये हम हिन्दुस्तानी कौन हैं? क्या है?
- उसमान गाजी जिसकी बुनियाद ही नफरत पे रखी हो उससे भलाई की उम्मीद बेईमानी है जनाब
Parmod Pahwa सर गुरु नानक देव जी की बेसिक फ़िलोस्फी सूफ़ीज़्म का परिवारिक दर्शन था जिसमे खुदा ( ईश्वर ) और इंसान का रूहानी ताल्लुक ही अहमियत रखता है ।
धर्म, नस्ल, जाति कुछ भी दरम्यान मे नही आता।
धर्मों के नाम पर दीवारे 1900 के आसपास खड़ी की गई, ख़ासकर पंजाब में कभी भी इस्लाम को दुश्मनी की निगाह से नही देखा गया।
आज भी पंजाब के अखाड़ो मे या अली के नाम से दम ठोका जाता है । अभी कल तक सिख और पंजाबी ( अरोरा,खत्री ) एक ही होते थे ,एक बेटा केश रखता था बाकी नही भी रखते थे मगर अब इनमे भी दरार पैदा कर दी गई
- Mohammed Seemab Zaman, Parmod Pahwa साहेब, कई दिन से यह पढ कर हम हैरान थे कि गुरू ग्रंथ साहेब में बाबा फरीद के क़ौल हैं। अब तो यकीन हो गया कि यही बहुसंख्यक समाज ने भारतीय समाज को बरबाद कर बँटवारा करवा दिया।
Kamran Rafiq, मै आप लोगों जितना पढ़ता तो नहीं हूं पर सिखों और पठानों को देखा तो अपनी इज्ज़त और नाक को लेकर लगभग सेम हैं, जान चली जाए पर आन न जाए और मजलूम और कमज़ोर पर ज़ोर आजमाइश नहीं करते संघी इसके ठीक उलट होते हैं
Lakhveer Singh Nandha Sikri हमारे गांव का भी एक पहलवान होता था हरदेव सिंह उर्फ देबा वो दंगल हरेक कुश्ती से पहले या अली का नारा लगाता था
Salman Siddiqui हक़ और हिकमत की बात जात-पात, मज़हब और सरहद से ऊपर होती है। बाबा फरीद के कलाम का गुरु ग्रंथ साहेब में होना इस बात की सबसे बड़ी गवाही है कि सच्चे लोग दिलों को जोड़ते हैं, नफ़रतें नहीं बोते। अफ़सोस ये है कि आज हम 700 साल पुराने दिलों के रिश्ते भूलकर 70