Post of 17 October 2025
आज 33 साल बाद भी हिन्दुस्तान की आत्मा, बाबरी के इर्द गिर्द ही भटक रही हैं।
हिन्दुस्तान के फ़्रॉड देशभक्त, भारत का इतिहास-भूगोल भूल कर मुस्लिम दुश्मनी और तिरस्कार को ही देशभक्ति का एक पैमाना बना लिया था।बाबरी शहादत के बाद 1993 से भारत Open Market से महंगा तेल खरीदता है, जिस का नतीजा है कि बनिया के किराना दुकान के तरह जहॉ सस्ता सामान मिला वहॉ से ख़रीदा मगर पब्लिक को बेचा महंगा।
बनिया की आदत, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी हरकत से बाज़ नहीं आई और रूस से सस्ता तेल 30% ख़रीद कर गौरवमयी हो गया।नमस्ते ट्रम्प ने इसी कमज़ोरी का नाहक़ फ़ायदा उठा लिया और आत्मा भटकाने लगा, जब कि यूरोप, चीन और तुर्की आज भी रूस का तेल ख़रीद रहा है।
हिन्दुस्तान के फ़्रॉड देशभक्तों को शरम अल शेख के समिट देख कर समझ आ गई होगी कि देशभक्ति किस को कहते है? रोड-गली-चौराहे पर नारा लगा कर जीडीपी जलाना देशभक्ति नही है, बल्की देश और जनता के लिए बुद्धिजीवियों की दूरंदेशी देशभक्ति का आयाम है।
दो साल तक पश्चिमी देश ख़ास कर अमेरिका ने ग़ाज़ा मे नस्ल-कुशी किया।हर मुमकिन कोशिश किया, यहॉ तक के क़तर पर बमबारी किया ताकि अरब देश समेत मिस्र, जॉर्डन इस जंग में कूदें और उन सब को अगले 50 साल के लिए बर्बाद कर दें जैसे मिस्र को 1973 में बर्बाद किया था या इराक़ को 9/11 के बाद बर्बाद किया।
अल्लाह का शुक्र है और बड़ा एहसान है कि तुर्क और अरब देश चुप-चाप सब बरदाश्त किया और बाबरी के तरह इस फितना को बड़ा नहीं होने दिया।तक़रीबन लाख लोग मरे, ज़ख़्मी हुऐ मगर इस फितना मे कोई अरब देश गली, चौराहे पर नारा लगा कर जंग में नहीं कूदा।
उल्टे दो साल में रूस-यूक्रेन जंग से पश्चिमी देश और अमेरिका आर्थिक तौर पर कमज़ोर हो गया और चीन बराबरी में नमस्ते ट्रम्प से बात करने लगा, रेयर अर्थ मेटल्स की आपूर्ती बंद कर दिया, अमेरिकी मालवाहक जहाज़ पर 100% टैक्स लगा दिया…..
सोवियत संघ जो मुस्लिम/अरब दुश्मनी के वजह कर टूटा, वह पुटिन आज मुस्लिम देशों के दोस्त बन्ने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।कल सीरिया के प्रेसिडेंट शाराअ से मॉस्को में हाथ मिलाया।
#NOTE: नमस्ते ट्रम्प हिन्दुस्तान के अर्थव्यवस्था के लिये न्यूसेंस, सरदर्द और उपद्र हो गये हैं।अगर ट्रम्प हिन्दुस्तान को सपोर्ट करते हैं तो पैसा वाला मुल्क अमेरिका में निवेश नहीं करे गा। जो $5-10 trillion निवेश का लालच दिया था, वह ज़बानी वादा ही रहे गा क्योंकि दो साल का ग़ाज़ा नरसंहार अमेरिका हार चूका, अरब कामयाब हुऐ और चीन विश्वशक्ति हो चूका है।
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Some comments
Mohammed Seemab Zaman उर्दू नाम वाले जॉडर्न जहॉ 90% फलस्तीनी रहते हैं उस को कोस्ते थे कि इसराइल को सपोर्ट करता है, airspace देता है, हूथी का मिज़ाईल रोक देता है, गद्दार है वगैरह वगैरह मगर आज जो हमास के फ़ौज की वर्दी और Toyota कार देख रहे हैं तो उलट-पलट लिख रहे हैं।अल्लाह का शुक्र है कि कोई अरब मूल्क इस लड़ाई में नहीं फँसा वरना अगले 50 साल के लिए अमेरिका अरब को ख़त्म कर देता।
- Riyaj Ahmad, Mohammed Seemab Zaman May Allah keep you safe and increase your knowledge and may we all be blessed.
وہ دیوانا تو نہ جانے کیا کیا بک رہا ہے – اب کہ رہے کہ حضرت کے پالٹکل کریر کو تباہ نہیں کرنا چاہتے ہیں – ویسے وہ اپنے بیانوں سے جاہل نظر آتے ہیں جب کہتے ہیں کی ہندوستان میں ہر سال نیا وزیر اعظم آتا رہا ہے – مگر ننہ جانے کیا بات ہے کہ ہم خاموش ہیں
ہم کچھ نہیں کر سکتے ہیں دیوانے کا- اگر ملک کو بچانا ہے تو نیا چہرہ لانا ہو گا، نیا وزیر اعظم بنانا ہو گا- باقی تو ہم نے نوٹ میں لکھ ہی دیا ہے-
Kamal Siddiqui Zaman सर,पीटर फ्रिडरीच का ये स्पीच सुनिये
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- Mohammed Seemab Zaman, Kamal Siddiqui साहेब, हम 2017 से लिख रहे हैं कि आदरणीय बहुत गौरवमयी हैं कि मलेशिया से North America तक संघ के संगठन को पहुँचा दिया। मगर लोग अब बोल रहा है। ग़ौर किया है सुब्रमण्यम स्वामी एक महीना से ग़ायब हैं, वह उसी को लिप-पोत रहे हैं, मगर कामयाबी नहीं मिले गी।
Saheel Shaikh, Mohammed Seemab Zaman साहब, जिस तरह आप कहते आएं हैं कि फिलिस्तीन मुस्लिम देशों का नही बल्कि यूरोप का मसला हैं ये बात सही साबित हुई और उसी तरह अब मुझे समझ आ रहा हैं कि भारत की संघी सरकार को हराने का ठेका भारतीय मुस्लिम अपने टूटे हुए कंधे पर उठाया घुम रहा हैं बल्कि अब भारत के मुसलमानो को समझने की जरूरत हैं कि ये संघी सरकार मुसलमानों का मसला नही बल्कि सेक्यूलर पार्टीयों और दलों का मसला है मुस्लिम को अब अपनी कयादत को चुनना चाहिए बाकी संघी सरकार से निपटने के लिए कांग्रेस सपा बसपा टीएमसी वगैरह को छोड़ देना चाहिए।
- Mohammed Seemab Zaman, Saheel Shaikh साहेब, “अब यह संघी सरकार संघ का प्रोब्लम है मुसलमानों का नही” मुसलमान इस सरकार के चक्रव्यूह में नहीं पड़े। अल्लाह का शुक्र अदा करें कि यह सरकार बन गई वरना संघीतकारो को बहुत अफ़सोस होता की संघ की सरकार नहीं बना वरना हम लोग विश्वगुरु हो जाते।
Tur Khan जब किसी इंसान की परवरिश किसी खास माहौल में बचपन से लेकर पचास साठ साल तक इतिहास और भूगोल को तोड़ मरोड़ कर हुई हो तो उसके बाद उस इंसान की सोच को बदलना असंभव हो जाता है।(जनसंख्या बड़ी है तो कुछ अपवाद भी होंगें). ये उन घोड़ों की तरह हैं जिनकी आंखों पर ब्लाइंडर्स लगा दिये जाते हैं। ताकि वो अपने मकसद से विचलित ना हो।