Post on 13 August 2025
पिछले हफ्ता, राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर रूस की तेल कम्पनी Rosneft से अपनी ज़रूरत का 30% तेल $119 billion मे ख़रीदने पर 25% अतिरिक्त टैरिफ़ लगा कर भारत पर 50% टैरिफ़ लगाने के आर्डर पर हस्ताक्षर कर दिया।
भारत की #आत्मा, बाबरी मस्जिद के भारत रत्न नरसिम्हा राव द्वारा गिराने के 33 साल बाद भी तेल के इर्द-गिर्द ही #भटक रही है। कहा जाता था कि प्रधानमंत्री राव बड़े विद्वान व्यक्ति थे जो 18 ज़बान जानते थे मगर आँख नही दिल अंधा था जिस के वजह कर भारत का हजा़र साल का इतिहास-भूगोल नहीं पढ़ा था।
*भारत अमेरिका को कपड़ा, एलेक्ट्रोनिक्स सामान वगैरह निर्यात करता है।भारत अमेरिका को उस के औद्योगिक और ज़ेवर की ज़रूरत का 68% हीरा निर्यात करता है और बाक़ी 28% इसराइल करता है। भारत ने 2021-22 में अमेरिका को $9.86 billion का हीरा (cut diamond) निर्यात किया मगर 2024-25 में केवल $4.8 billion ही कट-डायमंड निर्यात किया था।भारत अमेरिका से Raw diamond $2.8 billion का आयात करता है।
*भारत दुनिया का सब से बड़ा तेल आयातक देश है जो रोज़ 50 लाख बैरल तेल अरब या दूसरे मुल्कों से खरीदता है।रूस-यूक्रेन जंग (फ़रवरी 2022) के बाद रिलायंस रिफाइनरी ने रूस का तेल Rosneft कम्पनी से सस्ते दाम पर ख़रीदा और कम्पनी का 2025 मार्च तक $71.7bn रेवेन्यू हो गया जबकि उस के पहले $57.2bn ही रिफ़ाइनरी रेवेन्यू था। सस्ता तेल रिफाइन कर महंगे दाम मे 26% यूरोप को 10% दक्षिण अमेरिका को बेचा।
*ट्रम्प का कहना है कि भारत रूस का तेल ख़रीद कर यूक्रेन जंग में रूस की आर्थिक मद्द कर रहा है जबकि यूरोप तीन साल बाद अभी भी रूस से गैस ख़रीद रहा है। ट्रम्प खुद रूस से industrial quality rare earth metals ख़रीदते हैं।चीन $240 billion और तुर्की $23 billion का तेल रूस से ख़रीदा मगर ट्रम्प ने अतिरिक्त टैरिफ़ चीन और तुर्की पर नही लगाया।
कल ट्रम्प ने चीन से टैरिफ़ समझौता नवंबर तक बढ़ा दिया ताकि चीन का सस्ता सामान क्रिसमस में अमेरीका के लोगों को मिल जाये।
*भारत रत्न राव को पता था कि भारत अपनी ज़रूरत का 80% तेल विदेश से खरीदता है, अरब देश उस को subsidised rate पर तेल देते हैं और भारत 15-20 दिन का तेल भंडार ही रखता है, मगर अंधे दिल ने बाबरी मस्जिद गिरवा दिया।
बाबरी कांड के बाद, 1993 से अरब देशों ने subsidised तेल देना बंद कर दिया, भारत open-market से तेल ख़रीदने लगा और आज तक महंगे दाम पर खुले बाज़ार से तेल खरीदता है। भारत सरकार ने एयर इंडिया इसी तेल की मार के वजह कर टाटा को बेच दिया मगर तीन साल बाद भी वह एयर इंडिया को 1992 के मुक़ाम पर न ला सका।
पिछले हफ़्ता New York Times, US और Financial Times (FT), London में मुकेश अंबानी पर दो लेख छपा था।नीचे FT का मुकेश के लेख पर रूसी सस्ते तेल का ग्राफ़ है जो महंगे कार्गो के बाद भी सऊदी और इराक़ी तेल से बहुत सस्ता है। मगर ट्रम्प ने 50% टैरिफ़ लगा कर भारतीय अर्थव्यवस्था की “आत्मा-भटका” दिया।
#NOTE: ट्रम्प टैरिफ द्वारा बाबरी मस्जिद की “भटकती-आत्मा” तीन दश्क बाद भी तेल के रूप में भारत की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय साख को बर्बाद कर रही है।भारत का कोई नेता या बुद्धिजीवी या पत्रकार या संघीतकार यह बात न बोल रहा है और न लिख रहा है।
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Some comments on the Post
Mohammed Seemab Zaman 1992 मे गल्फ-वार के समय तेल का दाम $15 प्रति बैरल हो गया था मगर सद्दाम के कुवैत क़ब्ज़ा छोड़ने के बाद दाम $8 हो गया और भारत के अंधे दिल बहुत ख़ुश थे कि हम लोग अब दुनिया में कहीं से तेल ख़रीदें गें। बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथन मिश्र जो मौलाना जगन्नाथन मिश्र कहे जाते थे उन्होने भी बाबरी शहादत के बाद कहा था कि हम लोग अरब से तेल नहीं लें गें, अब नाइजीरिया से लें गें।
आज 33 साल बाद भी भारत की आत्मा तेल से भटक रही है मगर चीन सैन्य और आर्थिक महा शक्ति बन गया जो अरब से तेल खरीदता है और अरब से अपने यहॉ दुनिया का सब से बड़ा रिफाइनरी लगवाता है क्योंकि चीन को पता है कि भारत की तरह वह अगले पचास साल “अरब देशों के तेल और गैस” पर निर्भर रहे गा।
Imran Khan आप बाबरी भूलने नहीं देते हैं. ये बात मुझे बहुत पसंद हैं
एक बड़े सरकारी मुलाजिम हैं उनसे कभी जब बहस होती हैं तो ये बात पर थोड़ा चिढ़ जाता हैं कि आप हमेशा बाबरी के बारे में बोलते हैं. जब जवाब में सब्सिडी वाली बात बोलते हैं तो बग़ल झाँकने लगता हैं
- Mohammed Seemab Zaman बाबरी मस्जिद ने इस मूल्क को चीन नहीं बन्ने दिया। Subsidy ही नही, payment भी deferred होता था यानि तीन महीना बाद या 6 महीना बाद भारत सरकार पैसा देती थी। Open market से तो कैश देकर तीन महीना बाद delivery मिलता है।
Murtaza Khan जबरदस्त आलेख ज़नाब! आपने भारतीय अर्थव्यवस्था का पिछले तीस सालों का बहुत ही तार्किक विश्लेषण किया है, बावजूद भी संघ सरकार या इतिहास को लेकर हीन-भावना से ग्रसित देश के तथाकथित बुद्धिजीवी मुस्लिम खुन्नस में अभी भी अंधे बने हुए हैं। दूसरी बात “विश्वगुरू” या “डंका बजे रहा है” या “तीसरी- चौथी अर्थव्यवस्था” की खुशफहमी में इन्होंने अमेरिका से पंगा ले लिया है जो कि देश के लिए बहुत ही गंभीर होने वाली है और इसकी बहुत भारी कीमत हम सभी को चुकानी पड़ सकती है।
