The Post on 15th January 2026
अफ़सोस इस बात से है कि 1886 की दुनिया बदल गई है मगर हमारे अंधे दिल में रौशनी नहीं आ रही है और वह मुस्लिम की चूड़ी टाइट करने में आनंदमयी हो रहे हैं।
कल रात ट्रम्प इसराइल के कहने पर ईरान पर बमबारी करने वाले थे ताकि ग़ाज़ा के लिए जो “Technocrats Team” बनी है, उस को इसराइल की नाकामयाबी न समझा जाये।
कल सऊदी अरब, तुर्की, इजिप्ट और क़तर के कहने पर ट्रम्प ने बमबारी नहीं किया क्योंकि पूरा मिडिल ईस्ट को ईरान फिर कई साल के लिए disturb कर देता। तेल का दाम $100-150 प्रति बैरल हो जाता और ‘Make America Great’ का नारा हवा हो जाता, जैसे संघ प्रमुख आदरणीय मोहन जी का ‘विश्वगुरु’ का नारा हवा हो गया।
नीचे NYT के हेडलाइन के साथ का विडियो देखये और सूनये कि ट्रम्प क्या बोल रहे हैं, “ईरान ने मारना stopped and stopping कर दिया है, जबकि ईरान कहता है कि इरफ़ान सोलतानी को फाँसी की सज़ा हुई ही नहीं थी, उन को तो propaganda के आरोप मे पकड़ा गया है।
#NOTE: NYT हेडलाइन में कह रहा है कि इसराइल और अरब देशों ने ट्रम्प को ईरान पर बमबारी करने से मना किया है। यह कहते शर्म आ रहा है कि 1886 या WWII के बाद की दुनिया बदल गई है और “मुग़ल सल्तनत अब फिर सल्तनतें बनाने और बिगाड़ने की क़ुव्वत बन गई”
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Some comments on the Post
Mohammed Seemab Zaman, Murtaza Khan साहेब, हम दो हफ़्ता से ईरान पर पोस्ट नहीं किया था क्योंकि सब खबर झूठ और प्रॉपगैंडा था। आज NYT लिख रहा है इसराइल बमबारी के लिए मना कर रहा। यह लोग अभी भी narratives बनाने से बाज़ नहीं आते हैं जबकि दुनिया बदल चूकी है। अख़बार यह भी लिख रहा है कि ओमान में रूस-ईरान-अमेरिका बात फिर शुरू हो गया।
यह जो कश्मकश आप देख रहे हैं, वह चले गा क्योंकि रूस-यूक्रेन जंग चल रहा है। जंग बंद होते “मुग़ल सल्तनत की ख़ुशबू मिलने लगे गी”
- Shahnawaz Ansari, Mohammed Seemab Zaman inshaAllah sir

- Murtaza Khan, Mohammed Seemab Zaman डॉक्टर साहब मुझे तो लगता है ट्रम्प अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित होंगे क्योंकि इन्होंने कई फ्रंट पर मोर्चे खोल लिए हैं। देखिएगा ग्रीनलैंड इशू पर यूरोपिये देशों से इनकी जबरदस्त तरीके से ठनेगी और हमेशा से इनका पिछलग्गू रहा यूरोप भी अमेरिका को ऑंखें दिखाने में रियायत नहीं करेगा।
Salman Siddiqui दुनिया 1886 से लेकर WWII के बाद तक कई बार बदल चुकी है लेकिन सोच आज भी नफ़रत, वर्चस्व और दिखावे के इर्द-गिर्द घूम रही है. इंसानी जान, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति से ज़्यादा अहम इमेज मैनेजमेंट और सियासी नारे हो गए हैं. अगर इज़राइल के इशारे पर ईरान पर बमबारी होती, तो वह सिर्फ़ एक देश पर हमला नहीं होता पूरा मिडिल ईस्ट आग में झोंक दिया जाता. तेल के दाम आसमान छूते, दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगाती और वही ताक़तें सबसे पहले पीछे हटतीं जो आज युद्ध को दूर से उकसाती हैं. सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और क़तर का हस्तक्षेप बताता है कि अब इलाक़े के देश भी समझते हैं कि जंग का नतीजा सिर्फ़ तबाही होता है, जीत नही. NYT की हेडलाइन खुद बयान है कि आज ताक़त का संतुलन बदल रहा है
अब हर फ़ैसला एकतरफ़ा नहीं थोपा जा सकता. मगर हैरत इस बात की है कि कुछ लोग आज भी तालियाँ बजाने में लगे हैं कभी मज़हब के नाम पर, कभी पहचान के नाम पर जबकि असली क़ीमत आम इंसान चुकाता है. दुनिया आगे बढ़ रही है, लेकिन अंधे दिलों में रौशनी तब आएगी जब युद्ध को तमाशा नहीं, इंसानी त्रासदी समझा जाएगा। वरना महान बनने के नारे हर बार सच की दीवार से टकराकर हवा ही होते.
Dilawar Khan जी,, बिल्कुल,, बहुत खूब,. अरब देशों ने अपनी हिक्मत अमली से गल्फ देशों से अमेरिका का बोरिया बिस्तर उठवा दिया है,,, इसीलिए अमेरिका नया ठिकाना तलाश कर रहा है,,, ग्रीन लैंड उसी की कड़ी है. अमेरिका पता नहीं अचानक ईरान के पिछे क्यू पड गया था ?
अब अचानक ट्रंप कैसे पलटी मार गए. ये हमारे दार्शनिक प्रख्यात विश्व गुरु आदरणीय भागवत जी की मंडली के लिए सोचने का मकाम है,ये समय निकल गया तो फिर कभी सोचने का समय भी नहीं मिलेगा. बहुत देर हो चुकी होगी.
एक दोस्त कह रहे थे कि ये लोग किसी भी कीमत पर देश का पुरा कंट्रोल अपने मुताबिक कर लेना चाहते है. उसके बाद अपने मुताबिक नए तरीके से देश चलाना चाहते है. पर बदलती जियो पॉलिटिक्स को देखते हुए लगता है धोबी के कुत्ते जैसी हालत ना हो जाए,, कभी ना घर के रहे ना घाट के. ऐसा हमने पड़ोसी की मांग में सिंदूर भरते हुए शुरु मे कहा था कि ” हांसी में गल फांसी हो जावे. बाद मे ऐसा ही हुआ,, सिंदूर से पड़ोसी चौधरी बन गया है
- Mohammed Seemab Zaman, सही कहा, हमारे दार्शनिक प्रख्यात विश्व गुरु आदरणीय भागवत जी की मंडली के लिए सोचने का मकाम है,अचानक ट्रंप कैसे पलटी मार गए। हम तो 2015 जनवरी मे ओबामा के भारत यात्रा पर जो ड्रामा हुआ उस से होने वाले reaction पर यक़ीन रख कर पोस्ट लिख रहे थे मगर मोहन जी एंड पार्टी को समझ में ही नहीं आया। अब तो भारत को 100 साल की नीति को बदलना होगा क्योंकि दुनिया बदल गई है।


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