Post of 2nd October 2025
“न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुसन में रहीं शोख़ियाँ
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही, न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में”
हमारे आदरणीय विश्व प्रख्यात दार्शनिक,धाराप्रवाह हिन्दी वाचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, संघ प्रमुख, डाक्टर, मोहन जी ने इस वर्ष विजयदशमी उत्सव मे गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान के 350 वर्ष की बात से अपना भाषण शुरू किया।
*ज़ाहिर है, सरदारों और सिख, जिन्होंने ने सेना और मुक्ति वाहिनी द्वारा बांग्लादेश में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है, समाज की रक्षा किया, वह लोग भूल गया था जिस के कारण पश्चिमी देशों मे उठे सिखों के मसला को भूलाने के लिए गुरु तेग़ बहादुर के बलिदान को मोहन जी को याद करना लाज़िम था।
*हिमालय याद करते हुए आदरणीय मोहन जी ने कहा कि आज की हिमालय की व्यवस्था हमारे लिए खतरे की घंटी बजा रहा है, हमारे पड़ोसी देशों में भी हम ने अनुभव किया।आदरणीय मोहन जी ने यह सही खतरे से देशवासियों को आगाह किया है क्योंकि हिमालय से निकली नदी पर चीन चार बड़ा डैम बना कर हमारे नौर्थ इस्ट के सब से सुंदर और बड़ी नदी ब्रह्मपुत्रा का पानी सूखा दे गा।
*उन्होंने कहा की जनता को ध्यान में रख कर नितियॉ नहीं बनती है तो असंतोष बढ़ता है जिस के कारण हिंसा और विनाश होता है मगर इस तरह (Gen-Z) के आंदोलन से फ़ायदा नहीं है। जो भी क्रांती हुई मगर किसी क्रांती ने अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं किया।बाद में वह सब पूंजीवादी हो गया (चीन का नाम नहीं लिया)
*Gen-Z के आंदोलन के अराजकता से डर कर, झक मार कर पड़ोसी देश को याद किया और कहा “वह तो हमारे अपने थे, वह सब हमारे अपने हैं।यह जो हमारा आत्मीयता का संबंध है, अपने पन का संबंध है, इस वजह कर यह चिंता का विषय है।”
*सब से चौंकाने वाली बात भाषण में “नमस्ते ट्रम्प” के टैरिफ़ (Tariffs) को याद किया और बहुत सुंदर बोले मगर बोलने मे बहुत देर कर दिया, क्योंकि सौ साल बाद दुनिया बदल गई है। टैरिफ़ पर उन्होंने कहा कि अपने देश के हित के लिए की होगी मगर उस की मार तो सभी पर पड़ रही है। विश्व का जीवन परस्पर निर्भरता से ही चलता है, अकेला राष्ट्र अलगाव, isolation में जी नहीं सकता।अफ़सोस दिल में रोशनी आने मे बहुत देर हो गई।
#NOTE: कुल मिला कर भाषण हमेशा की तरह bombastic नहीं था।पहली बार अपने को हज़ारों साल का victim नहीं बताया और न ही आक्रांता को याद किया मगर पहली बार पड़ोसी को अपना कहा, यह शुभ समाचार है।
RSS@101 का भाषण सुन कर लगा कि अब संघ के इश्क़ में वह गर्मियाँ न रही और न हुसन में वह शोख़ियाँ बची।जय हिन्द।
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Some comments on the Post
Mohammed Seemab Zaman हम ने बचपन से संघ के विचार को पढ़ा है। मेरे घर पर Organiser अख़बार आता था और हम सब लोग पढ़ते थे। यही कारण है कि विजयदशमी का भाषण हमेशा पढ़ते थे और अब तो विडियो मिल जाता है।
Mozaffar Haque विश्व का जीवन परस्पर निर्भरता से ही चलता है, मगर यह “विश्व गुरु” ने कहाँ माना, बल्कि अपनी गोदी मीडिया से प्रचार प्रसार यही करवाया कि पूरा ब्रह्माण्ड इन्ही पर निर्भर है, नहीं तो फ़लाना भीक माँगने लगे गा, फ़लाने को खाने के लिए केवल खजूर मिले गा, फलाने को अब हम बोलेंगे कि “तू क्या है बे”…. अभी अभी इन्हों ने अपने देश द्रोह के सौ साल पूरे किए…. इनको बधाई.
Saeed Khan Arshi सर मुझे हमेशा आपकी एक बात याद रहती है। भारत के बहुसंख्यक बुद्धिजीवों अब यह भ्रम टूट चुका है कि संघ की सरकार आ जाती तो हम विश्व गुरु बन जाते।
