Post of 7th July 2025 اُس کی زمین بے حدود، اس کا افق بے ثغور اُس کے سمندر کی موج، دجلہ و دینوب و نیل (اقبال کی نظم “مسجد قرطبہ” کا چوتھا بند) हम कहते और लिखते आ रहे हैं… Continue Reading →
जर्मनी अभी भी दशकों बाद अपने नरसंहार के इतिहास का बोझ ढो रहा है और अभी दशकों ढोये गा। हम भारतीय अभी उसी इतिहास को यहॉ जी रहे हैं।क्या इस इतिहास को बदलने मे भारत मे बहुत देर हो चुका… Continue Reading →
Post of 6th March 2021 “ऐ मौजे दजला तू भी पहचानती है हम को अब तक है तेरा दरिया अफ़साना खॉ हमारा” “क़ाफला हेजाज़ मे एक हुसैन भी नहीगरचे है तेरा ताबेदार अभी गेसूये दजला व फेरात” मोहम्मद बदिउज़्ज़मॉ साहेब… Continue Reading →
Post of 5th March 2021 اے موج دجلہ تو بھی پہچانتی ھے ھم کو اب تک ھے تیرا دریا افسانہ خواں ھمارا आज पहली बार दो हजार के क्रिस्चन मज़हब के इतिहास मे पोप फ़्रांसिस मेसोपोटामिया (इराक़) पहुँचें। मेसोपोटामिया दो… Continue Reading →
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