The Post of 30 April 2026
आज तेल का दाम $126 प्रति बैरल हो गया। दुनिया के लिए, यह मौजूदा तेल कीमतों का झटका 1973 के तेल झटके से कहीं ज़्यादा दर्दनाक होगा।
यूऐई का OPEC से बाहर जाना geopolitical correction का एक बेहतरीन नमूना है।यूऐई के वजह कर तेल का दाम कम नहीं होगा और न ही ओपेक कमज़ोर होगा बल्कि ओपेक का importance और बढ़ जाये गा क्योंकि OPEC का सब से बड़ा oil producer सऊदी अरब है (निचे The New York Times का आज का ग्राफ़ देखें).
ओपेक से पहले भी Ecuador, Angola और Qatar बाहर निकल चूका है, मगर ओपेक पर कोई असर नहीं हुआ। क़तर अभी रूस के बाद दुनिया का सब से बड़ा गैस निर्यातक देश है।
2015 में रूस झक मार कर OPEC+ मे शामिल हुआ और आज दुनिया का 70% oil reserve ओपेक मुल्कों में है। रूस ओपेक का सदस्य बन्ने के बाद $90 billion का तेल निर्यात करने लगा जबकि पहले केवल $10 billion का करता था।
होर्मूज़ का रास्ता बंद होने से दुनिया के 40% तेल सप्लाई पर असर पड़ा है, दुनिया झूठ बोलती है कि होर्मूज़ से 20% तेल जाता है।अमेरिका-इसराइल-ईरान जंग अगर फिर शुरू हुआ तो तेल का दाम बढ़ कर $150-180 हो जाये और दुनिया की अर्थव्यवस्था को 1973 के जंग से ज़्यादा बर्बाद हो जाये गा।
#NOTE: मेरा कहना है कि हार्मूज़ स्ट्रेट के बंद होने से दुनिया के geopolitics और geoeconomics के बदलने में आसानी हो गई।इस जंग में Strait of Hormuz एक #हथिसार बन कर उभरा है, जो सौ-डेढ़ सौ साल के वर्ल्ड आर्डर को बदलने में मद्दगार साबित हुआ।
इस पोस्ट को इक़बाल के ग़ज़ल के शेर पर ख़त्म करते हैं जिस में उन्होंने कहा कि कब तक रावी (हिन्दुस्तान), नील (मिस्र) और फ़रात (इराक़) तीन छोटी-छोटी दरियाओं में क़ैद रहे गा। तेरा जहाज़ (सफ़ीना) तो पूरी दुनिया के समुंदर के लिए है,
“रहे गा रावी व नील व फरात में कब तक?
तेरा सफ़ीना केह है बहरे बेकरॉ के लिए”
اقبال نے سو سال پہلے یہ غزل لکھی تھی جو آج صحیح لگ رھا ہے
رہے گا راوی و نیل و فرات میں کب تک؟
ترا سفینہ کہ ہے بحر بیکراں کے لیے

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