The Post of 08-04-2026

فاطمہ! گوشبنم افشاں آنکھ تیرے غم میں ہے
نغمہ عشرت بھی اپنے نالہ ماتم میں ہے

इस पोस्ट को ईरान मे 200 बच्चियों के हलाकत के नज़र करते हुऐ इक़बाल की नज़्म “फ़ातिमा बिन अबदुल्लाह” के शेर से शुरू करते हैं।फ़ातिमा बिन अब्दुल्लाह वह लड़की हैं जो जंग तराबलस (1911) मे ग़ाजियों को पानी पिलाते शहीद हुईं,

*कल रात ट्रम्प ने “थूक चाट कर थूक फेंका, थूक फेंक कर थूक चाटा” वाली भारतीय कहावत को हम लोगों को फिर याद दिला दिया।

*ईरान-अमेरिका के युद्धविराम से यह जंग खत्म नहीं हुई है क्योंकि फलस्तीन मसला अभी भी हल नहीं हुआ है।मगर इस जंग से मिडिल ईस्ट में यूएई, बहरैन, कुवैत, क़तर, सऊदी अरब में 9/11 के बाद का बहुत बड़ा correction हो गया।

*ईरान ने इस जंग से अमेरिका के “सुपर पावर” स्टेटस को भाप की तरह हवा में उड़ा कर दुनिया के Geo-economics में बड़ा बदलाव ला दिया।

*इस जंग से चीन मिडिल ईस्ट में अमेरिका को replace करे गा। जापान-मिडिल ईस्ट collaboration and investment होगा।यूरोप के नेता लोग मिडिल ईस्ट का दौरा तेज़ करें गे मगर बहुत फायदा नहीं होगा।

“फ़ातिमा!गौ शबनम अफ़शा ऑंख तेरे ग़म में है
नग़मे इशरत भी अपने नायलह मातम में है”
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Some comments on the Post

Mohammed Seemab Zaman नज़्म “फ़ातिमा बिन अबदुल्लाह” इक़बाल ने 1912 मे लिखा था और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपने मशहूर जरीदह “अल हिलाल” मे 12 नवम्बर 1912 मे editorial note के साथ शाया किया केह “मुझे इक़बाल की इस नज़्म की “अल हिलाल” मे अशायत पर फ़खर है।”

जिन को इस नज़्म को पढ़ कर इस शेर को समझना है वह “जंग तराबलस” को नेट पर पढ़ें। मोहम्मद बदिऊज़्ज़मॉ साहेब ने अपनी किताब “इक़बाल की जोईग़र्फियाई और शख़्सियत से मंसूब इस्तलाह” में तफ़सील से लिखा है।

Md Umar Ashraf हम लोगों बचपन में अब्बू ये पढ़ाया करते थे-

फ़ातिमा तु आबरु ए उम्मत ए मरहूम है,
ज़र्रा ज़र्रा तेरी मुश्त ए ख़ाक का मासूम है।

ये सआदत, हूर ए सेहराई, तेरी क़िसमत मे थी,
ग़ीज़ियान ए दीन की साक़ाई तेरे क़िसमत मे थी।

ये जिहाद अल्लाह के रास्ते में बे-तेग़-ओ-सिपर,
है जसारत आफ़रीन शौक़ ए शहादत किस क़दर।

ये कली भी इस गुलिस्तान ए ख़ज़ां मंज़र में थी,
एैसी चिंगारी भी या रब, अपनी ख़ाकस्तर में थी।

अपने सेहरा में बहुत आहू अभी पोशिदा हैं,
बिजलीयां बरसे हुए बादल में भी ख़्वाबीदा हैं।

फ़ातिमा, गो शबनम अफ़्शां आंख तेरे ग़म में है,
नग़मा ए इशरत भी अपने नाला ए मातम मे है।

रक़्स तेरी ख़ाक का कितना निशात अंगेज़ है,
ज़र्रा ज़र्रा ज़िन्दगी के सोज़ से लबरेज़ है।

है कोई हंगामा तेरी तुरबत ए ख़ामोश में,
पल कही है एक क़ौम ए ताज़ा इस आग़ोश में।

बेख़बर हुं गर्चे उनकी वुसात से मैं,
आफ़रीनश देखता हुं उनकी इस मरक़द से मैं।

ताज़ा अंजुम का फ़ज़ा ए आसमां में है ज़हूर,
दीदा ए इंसान से नामेहरम है जिनकी मौज ए नूर।

जो अभी उभरे हैं ज़ुलमत ख़ाना ए अय्याम से,
जिन की ज़ौ ना आशना है क़ैद ए सुब्ह ओ शमा से

जिनकी ताबानी में अंदाज़ ए कुहन भी, नौ भी है,
और तेरे क़ौक़ब ए तक़दीर का परतो भी है।

  • Mohammed Seemab Zaman बहुत बहुत शुक्रिया।वालिद साहेब ने किताब में यह दो बंद लिखा है:

फ़ातिमा, गो शबनम अफ़्शां आंख तेरे ग़म में है,
नग़मा ए इशरत भी अपने नाला ए मातम मे है।

रक़्स तेरी ख़ाक का कितना निशात अंगेज़ है,
ज़र्रा ज़र्रा ज़िन्दगी के सोज़ से लबरेज़ है।

Syed Nafisul Hasan भले ही दुनिया के बहुत से देशों में लोकतंत्र प्रभावी ढंग से काम कररहा हो लेकिन धनाढ्य व शक्तिशाली देशों में सामंती दौर अभी भी आयडियल बना हुआ है। चाहे सोवियत यूनियन (रूस) हो चीन हो या यूएसए। अंतर बस इतना ही है कि युद्ध करके कोई देश हङप नहीं सकते तो धौंस धमकी या लालच से अपनी लाबी में लेआओ ।उपमहाद्वीप में तो लोकतंत्र रखैल बन कर रह गया है। आप जिस वर्ल्ड आर्डर की बात लिखते रहते हैं वही दुनिया में सल्तनत बदलने का तरीक़ा है। बक़ौल इक़बाल जमहूरियत को सुलतानी लिबास बना कर पेश किया जारहा है।

  • Mohammed Seemab Zaman जमहूरियत को सुलतानी लिबास बना कर “क़तल-व-ग़ारत” पेश किया जारहा है।

Ambuj Gupta Bhartiya सर आपका बहुत सम्मान करता हूं और हमेशा करता रहूंगा। कुछ पॉजिटिव बताइए, दुनिया किस रास्ते पर जा रही है?

  • Mohammed Seemab Zaman हम भी आप की बहुत इज़्ज़त करते है।हम अक्सर 1876 लिखते हैं और लिखते हैं कि दुनिया बदल रही है। हम दस साल में चीन और मिडिल ईस्ट पर बहुत पोस्ट लिखा, कुछ लोग हम को “ सऊदी नवाज़” कह कर ट्रौल करते हैं, बहुत को हम block कर दिया क्योंकि वह तफरीहन मेरे पोस्ट को पढ़ते थे।
  • देखये दुनिया 2014 में भारत में संघ की सरकार बन्ने के बाद बहुत तेज़ी से बदलने लगी और चीन strategically बहुत strong बनता गया जिस का नतीजा यह जंग है। हम लोग पाकिस्तान से आगे सोंच ही नही सके जिस का नतीजा है कि भारत में हम लोगं को समझ मे नही आया कि दुनिया बदल गई।
  • WWII के बाद दुनिया बदल गई और यह Asian युग की Positive शुरूआत है। बहुत अच्छा होगा, मायूस नहीं हों।
  • Sujeet Shandilya, Ambuj Gupta Bhartiya यह युद्ध अरब देशों को एक कॉन्फिडेंस देगा अमेरिका से आगे सोचने का। ईरान ने साबित कर दिया है कि इजरायल और अमेरिका दोनों को एक साथ हराया जा सकता है। जरूरत है विजन का। पैसा और तकनीक अब हर अरब देश के पास है।

Syed Shaad सर ये जंग अमेरिका इसराइल ईरान की जंग से क्या अब next फेज में फिलिस्तीन को लेकर अरब देश और इसरायल की जंग की तरफ shift हो सकती है.? क्या हमलोगों को फिलिस्तीन को लेकर भविष्य में अरब देशों और इसराइल के बीच एक और जंग होती दिख सकती है.?

Dilawar Khan बहुत उम्दा,, बहुत सही कहा आपने,,, अमेरिका के ताज को भाप की तरह हवा में उड़ा दिया,,, अब अरब देश फूंक फूंक कर कदम उठाएंगे,,, यूरोप सहित विकासशील देश इन्वेस्ट को तरसेगे.

Khan Tosif Ahmed ज़ब भी कुछ उथल पुथल होता है आपकी पोस्ट का बेसबरी से इंतेज़ार होता है सर. आपकी पोस्ट पढ़ कर मन शांत हो जाता है.

Abdul Raheem ये जंग बहुत बेहतर तरीके से ख़त्म हुई. इस एक महीने में दुनिया पांच साल आगे बढ़ गयी. अमेरिका के सिक्योरिटी गारंटी के नाम पर वहां रहने का जवाज़ भी नहीं रहा. आजकल लोग ये सब नहीं पढ़ते हैं. “तराबलस के शहीदों का है लहू इसमें…”
और बाल्कन में जो हुआ… इसलिए ही “नज़र पैदा” नहीं होती है, और जल्दबाज़ी करते हैं, और उल्टा सीधा लिखते हैं.

Kamil Khan मुझे जो नज़र आ रहा है, वो सब वही है जो आप से सीखा समझा है, के चीन का उदय, मुस्लिम दुनिया का वर्चस्व एक बार फिर कायम हो रहा है, अफगान जंग में मध्यस्ता क़तर ने की ग़ज़ा जंग में समझौता मिस्र में हुआ और ईरान अमेरिका जंग में मध्यस्ता पाकिस्तान कर रहा है, मतलब साफ़ है अब मुस्लिम देश किसी जनेवा UNO, चीन रूस यूरोप को चौधरी नहीं समझते हमारे मसले अब हम खुद सुलझाने मे सक्षम हैं, मुहातीर मोहम्मद कामियाब हुए.

Ambuj Gupta Bhartiya, Kamil Khan धर्म छोड़ना होगा या बक्से में बंद करके रखना होगा, अगर कुछ समझना है तो, वरना फिर ईरान लड़ेगा, अरब हंसेंगे और हमारे लोग, खैर उनपर कुछ कहना ही अब जहमत लगता है।